उज्जयिनी के द्वार
द्वार नहीं यह है इतिहास का आईन है ...................
उज्जयिनी को पृथ्वी की नाभि माना जाता है। इसी वजह से इसे कालगणना का प्रमुख केंद्र का दर्जा प्राप्त है। उज्जयिनी के वैभवशाली इतिहास को प्रदर्शित करते यहां कई अवशेष वर्तमान में मौजूद हैं। नगर की सीमा को दर्शाते पुरातन काल में बनाए गए कई द्वार आज भी ऐतिहासिक धरोहर के रूप में अपनी पहचान कायम रखे हुए हैं। इनमें से कई द्वारों का जीर्णोद्वार प्रशान द्वारा करवाया जा चुका है वहीं कई अपेक्षित हैं। पुरातन विभाग द्वारा इन्हें संरक्षित घोषित किया जा चुका है। वहीं कई नवीन द्वार कुछ समय पूर्व ही बनाए गए हैं जो नगर की सुंदरता में इजाफा कर रहे हैं।
सतीगेट:-
यह द्वार पुराने शहर के व्यस्ततम क्षेत्र कंठाल व गोपाल मंदिर के मध्य स्थित है। इस द्वारा के ऊपरी भाग में 12 देवीयों का मंदिर भी स्थित है। मंदिर के पुजारी जगदीशचंद्र भट्ट ने बताया कि मान्यता के अनुसार इस द्वार का निर्माण सम्राट विक्रमादित्य द्वारा करवाया गया था। इसके ऊपरी भाग में स्थित माता मंदिर का उल्लेख स्कंदपुराण में भी आता है। ऐसी भी मान्यता है कि माता सती के प्रमुख 12 तांत्रिक रूप यहाँ एक साथ विराजित है। चैत्र व शारदीय नवरात्रि की अष्टमी को यहाँ सौभाग्य कुमकुम आरती की जाने की प्राचीन परंपरा है। पुरातत्व विभाग द्वारा इस द्वार को संरक्षित घोषित किया गया है।
चोबीस खम्बा द्वार:-
11वीं-12वीं शताब्दी में निर्मित यह द्वार महाकाल मंदिर से कुछ दुरी पर स्थित है। यह द्वार चैबी खंभों पर आधारित है। इसके नीचे देवी महामाया व महालया के मंदिर स्थापित है। ऐसी मान्यता है कि पूर्व में यहा पशुबलि दी जाती थी, लेकिन वर्तमान में यहाँ शारदीय नवरात्रि की अष्टमी को शारदीय पूजा का विधान है। पुजारी जगन्नाथजी ने बताया कि इस द्वार का निर्माण भी सम्राट विक्रमादित्य द्वारा करवाया गया था। यह द्वार 25 फीट ऊंचा है वहीं इसके ऊपरी भाग में जाने का कोई मार्ग नहीं है। म.प्र. प्राचीन स्मारक पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम 1964 का (13) व नियम 1973 के तहत इस द्वार को राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है।
गणगौर द्वार:-
यह द्वार दानी गेट क्षेत्र में शिप्रा नदी के तट पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि विक्रमादित्य के शासनकाल में ही इसका निर्माण किया गया था। योगमाया माता मंदिर के समीप यह द्वार नगर की सीमा पर स्थित था। इसके दूसरी और शिप्रा नदी बहती थी वर्तमान में यह द्वारा शासन की उपेक्षा का शिकार है। स्थानीय रहवासियों द्वारा समय-समय पर यहाँ रंग-रोगन किया जाता है यह भी संरक्षित स्थल है। वर्तमान में यह द्वार लाल रंग से पुता होने के कारण आकर्षक लगता है।
महामृत्युंजय द्वार:-
इन्दौर मार्ग पर इस द्वार क निर्माण सितंबर 2008 में उज्जैन विकास प्राधिकरण द्वारा शुरू करवाया गया है। बड़ी-बड़ी शिलाओं से निर्मित इस द्वार पर आकर्षक नक्काशी की गई है। यह द्वार इंदौर रोड़ से आने वाले श्रद्धालुओें को सीधे महाकाल मंदिर मार्ग से जोड़ता है। इंदौर मार्ग से आने वाले श्रद्धालु इस आकर्षक द्वार को देखते ही धार्मिक नगरी उज्जयिी में प्रवेश का आभास महसूस करने लगते हैं।
अंकपात द्वार:-
यह द्वार सिंहस्थ क्षेत्र के अंकपात मार्ग पर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि इसका निर्माण भी सम्राट विक्रमादित्य ने करवाया था। उस समय गढ़कालिका क्षेत्र घने वनों से घिरा था तथा यह द्वार नगर की सीमा को प्रदर्शित करता था। पूर्व में विजयादशमी के अवसर पर शहरवासी श्रेष्ठ मुहूर्त में यहां आकर देवी की पूजा किया करते थे। इस द्वार के नीचे देवी शाभवी व वैष्णवी की प्रतिमा स्थापित है। 1992 के सिंहस्थ में शासन द्वारा इसका जीर्णाेद्धार करवाया गया।
